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vedic cevilization, Indian history for ssc, bank, railway in hindi ( प्राचीन भारत का इतिहास वैदिक काल,वैदिक संस्कृति, ऋगवेद काल)

 vedic cevilization, Indian history for ssc, bank, railway in hindi ( आज का टॉपिक प्राचीन भारत के इतिहास से लिया गया है जिसे वैदिक काल,वैदिक संस्कृति, ऋगवेद काल है आदि नाम से जाना जाता है।)




Indian history vedic cevilization (वैदिक काल,वैदिक संस्कृति, ऋगवेद काल)

Indian history
Vedik civilization

वैदिक वैदिक काल का तात्पर्य-

वैदिक काल उस काल को कहते हैं जिसमें वैदिक ग्रन्थ की रचना की गई थी। इन ग्रन्थों विशेषता यह है कि यह एक दूसरे से सम्बद्ध हैं और इनका क्रमागत विकास हुआ है। सबसे पहले ऋग्वेद तथा उसके बाद अन्य वेदों की रचना की गई। सिंधु संस्कृति के पतन के पश्चात भारत में जिस नवीन सभ्यता का विकास हुआ उसे वैदिक अथवा आर्य सभ्यता के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार भारत का इतिहास एक आर्य जाति से संबंधित है । विद्वानों के अनुसार भारतीय इतिहास में 1500 ई. पू. से 600 ई. पू. तक के कालखंड को वैदिक सभ्यता या ऋग्वैदिक सभ्यता की संज्ञा दी जाती है। 
वैदिक सभ्यता को  2 भागो में विभाजित किया जा सकता है
 1. ऋग्वैदिक काल 1500 ई. पू.-1000 ई. पू. तक ।
 2. उत्तर वैदिक काल: 1000 ई. पू.-600 ई. पू. तक ।


ऋग्वैदिक काल (1500 - 1000 ई.पू.) 

सिंधु सभ्यता नगरीय थी जबकि वैदिक सभ्यता एक ग्रामीण सभ्यता थी। ऋग्वैदिक समाज का आधार परिवार था। परिवार पितृ-सत्तात्मक होता था। परिवार का मुखिया पिता या परिवार का कोई बुजुर्ग हुआ करता था। जो परिवार के अन्य सदस्यों पर पूरा नियंत्रण रखता था।

ऋग्वेद काल मे राजनीतिक संगठन राजतंत्रात्मक हुआ करता था। क्योंकि ऋग्वेद से अनेक राजाओ का उल्लेख मिलता है। कई कुटुम्ब से मिलकर एक 'विस' बनता जिसका  का प्रधान विसपति होता था। कई गांव को मिलाकर ग्राम बनता था। जन का रक्षक गोप होता था जो प्रायः स्वयं  राजा  होता था।

आर्यो का आर्थिक जीवन के मूलभूत व्यवसाय कृषि व पशुपालन थे। कृषि योग्य भूमि को उर्वर अथवा क्षेत्र कहा जाता था। ऋग्वैदिक सभ्यता के लोग व्यापार भी करते थे। ये लोग विदेशी तथा आंतरिक दोनों प्रकार का व्यवसाय करते थे। प्रारम्भ में व्यापार वस्तु विनिमय द्वारा होता था। बाद में गाय द्वारा मूल्य आंका जाने लगा और अन्त में सोने-चांदी का प्रयोग होने लगा और निष्क नामक मुद्रा का व्यवहार होने लगा । कपड़े, चमड़े तथा चादरे व्यापार की मुख्य वस्तुएं होती थीं। माल ले जाने के लिए गाड़ियों तथा रथों का प्रयोग किया जाता था। नदियों को पार करने के लिए नावों का प्रयोग किया जाता था।


उत्तर वैदिक काल: 1000 ई. पू.-600 ई. पू. तक

भारतीय इतिहास में उस काल को, जिसमें सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद तथा ब्राह्मण ग्रंथों आरण्यकों एवं उपनिषद् की रचना हुई, को उत्तर वैदिक काल कहा जाता है। चित्रित धूसर मृदभांड (printed grey earthen ware) इस काल की विशिष्टता थी, क्योंकि यहां के निवासी मिट्टी के चित्रित और भूरे रंग के कटोरों तथा थालियों का प्रयोग करते थे। वे लोहे के हथियारों का भी प्रयोग करते थे। 1000 ई०पू० में पाकिस्तान के गंधार में लोहे के उपकरण प्राप्त हुए हैं। वहां कब्र में मृतकों के साथ लोहे के उपकरण प्राप्त हुए हैं। 800 ई०पू० के आसपास इसका उपयोग-गंगा यमुना दोआब में होने लगा था उत्तरी दोआब में चित्रित धूसर मृदभाण्ड के 700 स्थल मिले हैं, जिसमें चार की खुदाई हुई है।
(1) अंतरजीखेड़ा
(2) जीखेड़ा
(3) हस्तिनापुर
(4) नोह
अभी तक उत्खनन में केवल अंतरजीखेड़ा से ही लौह उपकरण के साक्ष्य मिले हैं। उत्तर । वैदिक ग्रंथों में लोहे के लिए लौह अयस्क एवं श्याम अयस्क शब्द का प्रयोग हुआ है। अंतरजीखेड़ा में पहली बार कृषि से सम्बन्धित लौह उपकरण प्राप्त हुए हैं।


वेद - वेद विद् शब्द से बना है। जिसका अर्थ ज्ञान है। वैदिक ग्रन्थों विशेषकर ऋग्वेद का विश्व के इतिहास में सर्वोच्च स्थान है। वेद विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं। इनकी रचना भारत की ही पवित्र भूमि में हुई थी। ये ग्रन्थ इस बात को सिद्ध कर देते हैं कि भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति विश्व में सबसे अधिक प्राचीन है।

वेदों की संख्या-

ऋग्वेद कालीन मुख्यतः 4 वेद है।

1) ऋग्वेद 
इसमे देवताओं तथा गाये की स्तुति में गाये गए मंत्रो का संग्रह है। मंत्रो में गाये का उल्लेख कई बारे मिलने से सिद्ध होता है कि ऋग्वेद कालीन सभ्यता में गाये एक मत्वपूर्ण तथा पूजनीय पशु था। 
ऋग्वेद की रचना महर्षि कृष्ण द्वैपायन ने की थी जिन्हें हम वेदव्यास के नाम से भी जानते है।
इसमे 10 मंडल, 1028 सूक्त(hymns) तथा 10462 मंत्र या श्लोक है।  ऋग्वेद में सबसे प्राचीन तथा पवित्र नदी सरस्वती नदी थी।

2) सामवेद 
साम का अर्थ है संगीत। सामवेद  को भारतीय संगीत का जनक कहा जाता है। क्योंकि इसमें ही सात स्वर (सा....रे....गा...मा..) की जानकारी मिलती है।

3) यजुर्वेद
यजु का अर्थ है यज्ञ,   यजुर्वेद में  यज्ञ की विधियों का वर्णन किया गया है तथा बलि से संबंध मंत्रो का जिक्र मिलता है। 


4) अथर्ववेद
अथर्ववेद का नाम अथर्वा ऋषि के नाम पर  पड़ा है।
अथर्ववेद को ब्रह्मवेद (श्रेष्ठ वेद) भी कहा जाता है।
अथर्ववेद में 20 अध्याय, 731 सूक्ति तथा 6000 मंत्रो का उल्लेख मिलता है। अथर्ववेद में कुरु के राजा परिक्षित का वर्णन है। जिसे मृत्युलोक का देवता कहा गया है।


वैदिक काल मे प्रचलित 16 संस्कार

 1. गर्भाधान (निषेक)- उद्देश्य नर-नारी का मिलन संतान प्राप्ति हेतु।
 2. पुंसवन - गर्भ-रक्षा एवं पुत्र-प्राप्ति हेतु।
3. सीमन्तोन्नयन - गर्भस्थ शिशु की मानसिक वृद्धि हेतु।
4. जातकर्म - शिशु उत्पन्न होने पर पिता द्वारा शिशु को आशीर्वाद देने व शहद चटाने का कर्म।
 5. नामकरण/नामधेय - शिशु का नामकरण।
 6. निष्क्रमण - गृह से बाहर लाने का कर्म (शिशु के पिता या मामा द्वारा)  
7. अन्नप्राशन - अन्नादि चटाने का कर्म।
8. चूड़ाकर्म/मुण्डन - केश मुंडन का कर्म (केवल बालकों तक सीमित)
9. कर्ण-छेदन - कान छेने का कर्म।
10. विद्यारंभ - गुरू के पास ले जाकर शिशु को अक्षर ज्ञान कराने का कर्म।
11, उपनयन - इसमे पुरूष  (जनेऊ) धारण कर ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश करता है।
12. वेदारंभ - वेद आरंभ करने का कर्म।
13. समावर्तन - शिक्षा पूरी होने पर व्यक्ति घर की ओर लौटना।
14. विवाह - 25 वर्ष पूरा होने पर विवाह कर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश।
15. वानप्रस्थ - 50 वर्ष पूरे होने पर वन की ओर प्रस्थान ।
16, अंत्येष्टि - अंतिम दाह संस्कार ।

परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य

  1. वैदिक गणित का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ शुल्व सूत्र है, इसमें यज्ञ स्थल तथा मापन से संबंधित नियम वर्णित हैं
  1. ऋग्वैदिक लोगों द्वारा सर्वप्रथम तांबे का प्रयोग किया गया था। ऋग्वेद में आयस नामक धातु का उल्लेख है किंतु इसकी पहचान अभी तक नही की जा सकी है। कुछ विद्वान इसे तांबा, कांसा, या लोहा बताते हैं। किंतु ऋग्वैदिक आर्य लोहे से परिचित नहीं थे ।
  1. वैदिक युग में राजा अपनी जनता से जो कर वसूल करते थे उसे 'बलि' कहा जाता था, 'बलि' को एकत्रित करने वाला अधिकारी  भागदुग कहलाता था जबकि संग्रहिता' कोषाध्यक्ष का कार्य संभालते थे।
  1. प्रसिद्ध गायत्री मंत्र' ऋग्वेद के तृतीय मंडल से लिया गया है। यह मंत्र सूर्य देव को समर्पित है।
  1. आरंभिक वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था व्यवस्था पर आधारित थी। ऋग्वेद के नवें मण्डल में एक स्थान पर उल्लेख मिलता है कि मेरे पिता  वैद्य हैं, मेरी माता चक्की चलाने वाली और मैं कवि हूँ।
  1. वैदिक आर्यों के भोजन में दूध, घी, दही आदि का प्रमुख महत्त्व था। ऋग्वेद में दूध में यव (जौ) डाल कर क्षीर पकोदन तथा दही में बनने वाले पनीर का उल्लेख मिलता है। 

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