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History| Ancient history: Stone Age in India in Hindi ( पाषाण काल, मध्यपाषाण काल, ताम्र पाषाण काल का इतिहास)


दोस्तो इस भाग में हमने भारत के  पाषाण काल, मध्यपाषाण काल, ताम्र पाषाण पुरापाषाण काल की संस्कृति तथा नवपाषाण काल की विशेषता का विस्तृत अध्ययन करेंगे। इस भाग से परीक्षा में बहुत कम प्रश्न पुछे जाते फिर भी अध्ययन की दृष्टी से यह एक महत्वपूर्ण टॉपिक है।

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               पाषाण कालीन सभ्यता 

पाषाण काल का अर्थ:-

पाषाण का अर्थ होता है पत्थर; और काल का अर्थ होता है समय । अतएव पाषाण काल का शाब्दिक अर्थ हुआ पत्थर का समय। दूसरे शब्दों में पाषाण काल हम उस समय को कह सकते हैं जब मनुष्य अपने औजार तथा आवश्यकता की अन्य वस्तुएं पत्थर की ही बनना था और धातुओं का प्रयोग करना वह नहीं जानता था। जब मनुष्य ने प्रथम बार इस पृथ्वी पर अपनी आंखें खोलीं, तब अपनी रक्षा के लिए उसे पत्थर नहीं मिला। उन दिनों मनुष्य  असभ्य था और जंगली जीवन व्यतीत करता था, परंतु धीरे-धीरे वह सभ्य जीवन की ओर आगे बढ़ने लगा। अतएव व्यापक अर्थ साथाण काल मानव सभ्यता के उस उपकार को कहते हैं जब अपनी आवश्यकता की सभी चीज पत्थर की बनाना चीजें पत्थर को बनाया था और घात का प्रयोग करना नहीं जानता था। पाषाण काल को दो भागों विभक्त किया जाता है।  अर्थात  पर्व-पाषाण काल तथा उत्तर-पाषाण काल । 

                    पुरा पाषाणकालीन संस्कृतियाँ 

भारत में पुरापाषाण युग के, औजार-प्रौद्योगिकी के आधार पर तीन अवस्थाओं में बांटा जा सकता है। ये अवस्थाएं हैं  (1) पू’-पुरापाषाण युग :- हस्त कुठार (ड ऐक्स) पर विदारणी  (क्लीवर) उद्योग।
 (2)  मध्य पुरा पाषाण युग :- शल्क (फ्लेक) से बने औजार  (3) उतर पुरा पाषाण युग :- शुल्कों और फकों (नेट) पर बने औजार।


पुरा पाषाण काल में प्रयुक्त होने वाले उपकरणों के
आकार व जलवायु में होने वाले परिवर्तन आधार पर इस काल को हम तीन वर्गों में विभाजित कर सकते हैं-
 (1) निम्न पुरा-पाषाण काल (250000-100000 ई०पू०) (2) मध्य पुरापाषाण काल (100000-40000ई०पू०)।
 (3) उच्च पुरा-पाषाण काल (40000-10000 ई०पू०) 


पूर्व-पाषाण काल:- मानव सभ्यता के प्रारम्भिक काल को पूर्व-पाषाण काल के नाम से पुकारा गया है। इस काल आरम्भ अब से छ: लाख पहले हुआ लगभग 10 हज़ार साल पूर्व इसका अंत हुआ था। 

 निवासी:- विद्वानों की धारणा है कि इस युग के लोग हब्शी जाति के थे। इन लोगों का रंग काला और कद छोटा होता था। इनके बाल ऊनी होते थे और इनकी नाक चपटी होती थी। इनके वंशज अब भी अण्डमान द्वीप में पाये जाते हैं। 


औजार:इस युग के लोग अपने सभी औजार पत्थर के बनाते थे। यह पत्थर कठोर चट्टानों से काट लिये जाते थे, फिर आवश्यकतानुसार विभिन्न प्रकार की चीजें बना ली जाती थीं। पत्थर के बने औजारों से वे पशुओं का शिकार करते थे। इसी के अनेक हथौड़े, रुखानी टि होते थे जिनसे वे ठोंकते तथा छेद करते थे। पत्थर के इन औजारों में लकड़ी तथा हड्डियों के बेंट लगे रहते थे, लकड़ी तथा हड्डियों के भी औजार होते थे, परन्तु वे नष्ट हो गये हैं।



जीविका के साधन :इस युग के लोग अपनी जीविका के लिये पूर्ण रूप से प्रकृति पर निर्भर । खेती-बाड़ी करना बिल्कुल नही जानते थे।अपनी जीविका चलाने के लिए यह लोग जंगली पशुओं का शिकार किया करते थे और मछलियां पकड़ने थे। 


निवास स्थान :- 
इस काल के लोग नदियों के किनारे जंगलों में रहा करते थे। नदियों से इन्हें पीने को पानी मिल जाता था और जंगलों इन्हें खाने के लिए फल तथा पशुओं से मांस प्राप्त हो जाता था। ठंड धूप तथा वषों से अपनी रक्षा करने के लिए यह वृक्षों तथा पर्वतों की कन्दराओं निवास किया करते थे। कभी-कभी पेड़ों की डालियों तथा पत्तियों की झोंपड़ियां भी बना लिया करते थे।


 वस्त्र:- यह निश्चित रूप से बतलाना कठिन है कि यह लोग वस्त्र पहनते थे अथवा नंगे घुमा  करते थे। अधिक सम्भावना यही है कि यह लोग । परन्तु कुछ विद्वानों की धारणा है कि यह लोग वृक्षों की पत्तियां, छाल तथा पशुओं की खाल से अपने शरीर को ढक कर रखते थे। 

संगठन:- इस युग के लोग टोलियां बनाकर रहते थे। प्रत्येक टोली का एक प्रधान होता था और इसी प्रधान के नेतृ टोलियां आहार की खोज में एक स्थान जाया करती थी।  इन्हें शिकार, कन्द, मूल, फल आदि पाने की आशा होती थी, वहीं पर यह लोग चले जाया करते थे। 
शव-विसर्जन :-अधिकांश विद्वानों की यह था कि इस युग के लोग अपने मुर्दों को गाड़ दिया करते थे और मृतक शरीर रंग दिया करते थे। यह भी सम्भव है कि लोग अपने मर्दो को फेंक दिया करते थे। जिन्हें पशु-पक्षी खा जाया करते थे। 

पूर्व पुरा-पाषाण काल के महत्वपूर्ण स्थल

 पहलगाम -                         कश्मीर 
बेलनघाटी-                           इलाहाबाद जिले में (उ०प्र०) भीमबेटका और आदमगढ़-      होशंगाबाद जिले में (म०प्र०) 16 आर और सिंगी तालाब -     नागौर जिले में (राजस्थान) नेवासा-                             अहमदनगर जिले में (महाराष्ट्र) 
हुस्गी-                                     गुलबर्गा जिले में (कर्नाटक) अतिरम्पक्कम-                          तमिलनाडु

                        मध्य पाषाण काल

 इस काल में प्रयुक्त होने वाले उपकरण आकार में बहुत छोटे होते थे, जिन्हें (माइक्रोलिथ लघु पाषाणोकरण) कहते थे। पुरा पाषाण काल में प्रयुक्त होने वाले कच्चे पदार्थ क्वार्टजार के स्थान पर मध्य काल में जेस्पर, एगेट, चर्ट, चाल सिडनो जैसे पदार्थ प्रयुक्त किये गये। इस समय के  उपकरण राजस्थान, मालवा, गुजरात, पश्चिमी बंगाल, उडीसा, आंध्र प्रदेश एवं मैसूर में पाये गये हैं। अभी हाल में ही कुछ अवशेष मिर्जापुर के सिंगरौली, बांदा एवं विन्ध्य क्षेत्र से भी प्राप्त हुए हैं। मध्य पाषाण कालीन मानव अस्थि पंजर के कुछ अवशेष प्रतापगढ़ (उ०प्र०) के सराय नाहर तथा महदहा नामक स्थान से प्राप्त हुए हैं। 
मध्य पाषाण कालीन जीवन भी शिकार पर अधिक निर्भर था। इस समय तक लोग पशुओं में गाय, बैल, भेड़, बकरी, घोड़े एवं भैंसों का शिकार करने लगे थे। मध्य पाषाण काल के अन्तिम चरण में कुछ साक्ष्यों के आधार पर प्रतीत होता है कि लोग कृषि एवं पशु पालन की ओर आकर्षित हो रहे थे। इस समय मिलीं समाधियों से स्पष्ट होता है कि यह लोग अन्त्येष्टि क्रिया से परिचित थे। मानव अस्थि पंजर के साथ कहीं-कहीं | पर कुत्ते के अस्थि पंजर भी मिले हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि ये मनुष्य के प्राचीन सहचर थे।





 उत्तर-पाषाण काल:-
 पूर्व पाषाण काल के बाद उत्तर-पाषाण काल का आरम्भ होता है। पूर्व का अर्थ होता है पहले, उत्तर का अर्थ होता है बाद का। चूंकि उत्तर-पाषाण काल का आरम्भ पूर्व-पाषाण बाद हुआ; अतएव इस युग को उत्तर पाषाण काल के नाम से पुकारा गया है। पूर्व-पाषाण काल अन्त अब से दस हजार वर्ष पहले माना है, अवएव उत्तर पाषाण आरम्भ यहीं से होता है। इस युग के लोग पूर्व-पाषाण काल के लोगों से कहीं अधिक सभ्य हो  गये थे और उनके जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन आ गया था। 

कृषि:- कृषि का प्रारम्भ  उत्तर-पाषाण काल में अवश्य हुआ; पर सर्वप्रथम किस स्थान पर कृषि-कर्म प्रारम्भ हुआ, यह विवाद का विषय है। 1947 से चल रही खुदाई में तक प्राप्त साक्ष्य से ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि सिंध और बलूचिस्तान की सीमा पर स्थित कच्छी मैदान में बोलन नदी के किनारे नेहरगढ़ नामक स्थान पर कृषि-कर्म का पहला साक्ष्य मिलता है। इस सभ्यता के लोग अग्नि का प्रयोग प्रारंभ कर चुके थे। कुम्भकारी सर्वप्रथम इसी काल में दृष्टिगोचर होती है।

 औजारों की उन्नति :इस युग में भी औजार पत्थर के बने होते थे, परन्त वह पूर्व-पाषाण काल के औजारों की अपेक्षा अधिक साफ तथा सुन्दर होते थे। उनको रगड़ कर चिकना कर लिया जाता था। लकड़ी हड्डियों अब पहले से  भी अधिक प्रयोग होने लगा। उनके औजारों में अनेकरूपता आ गई और धनुष, बाण, भाले, चाकू, कुल्हाड़ी के अतिरिक्त हल, हंसिया, घिरनी, सीढ़ी, डॉग, तकली आदि भी बनायी लगी। 


कृषि का आरम्भ:- 
पूर्व-पाषाण काल में मनुष्य पूर्णरूप संप्रकृतिजीवी था और शिकार करके तथा फल खाकर अपना पेट भर लेता था, परन्तु उत्तर पाषाण काल में उसने कृषि करना आरम्भ कर दिया। खेती हल तथा बैलो से की जाती थी। पौधों को काटने के लिए हाशिये का प्रयोग किया जाता था। अनाज पीसने के लिए चक्कियां होती थीं।


पशुपालन:-  उत्तर-पाषाण काल के लोगों ने इस बात का अनुभव किया कि यदि पशुओं की हत्या करने के स्थान पर उनको पाला जाय तो उनसे अधिक लाभ होगा। अतएव इन लोगों ने पशु पालन आरम्भ कर दिया और गाय, बैल, भैंस, भेड़, बकरी, कुत्ता, घोड़ा आदि जानवरों को पालना आरम्भ कर दिया। 


मिट्टी के बर्तनों का निर्माण:- पूर्व-पाषाण काल के लोग अपनी आवश्यकता की सभी चीजें केवल पत्थर की ही बनाते थे। उत्तर पाषाण काल के लोगों ने मिट्टी के बर्तन बनाना आरम्भ कर दिया। कृषि तथा पशु पालन का काम आरम्भ हो जाने के कारण अब इन लोगों के पास सामान अधिक हो गया। अतएव अपने सामान को सुरक्षित रखने के लिए इन लोगों ने मिट्टी के बर्तन बनाना आरम्भ कर दिया। अभी पहिये का आविष्कार नहीं हुआ था, अतएव बर्तन हाथ से बनाए जाते थे। 


वस्त्र निर्माण:- पूर्व-पाषाण काल के लोग सिर्फ पेड़ों की पत्तियां, उनकी छाल तथा पशुओं के चमड़े से अपने वस्त्र बनाते थे, परन्तु उत्तर-पाषाण काल के लोगों ने पौधों के रेशों तथा ऊन के धागे को कातना आरम्भ किया और उन्हें बुनकर वस्त्र बनाने लगे, क्योंकि खुदाई में बहुत सी तकलियां तथा करघे मिले हैं। यह लोग वस्त्रों को रंगना भी सीख गये थे।

 गृह निर्माण:- पूर्व पाषाण काल का मनुष्य कन्दराओं तथा वृक्षों के नीचे ही निवास करता था, परन्तु उत्तर-पाषाण काल के लोगों ने घर बनाना आरंभ कर दिया। इनके घरों की दीवारें । लकड़ी तथा नारियल के तनों की होती थी और उन पर मिट्टी का लेप लगा दिया जाता था। छत लकड़ी, पत्ती, छाल आदि की बनी होती थी और फर्श कच्ची मिट्टी का बना होता था।

कार्य विभाजन तथा वस्तु विनिमय :-उत्तर-पाषाण काल के लोगों ने भिन्न-भिन्न प्रकार के कायों को करना आरम्भ कर दिया था। कोई खेती करता था तो कोई मिट्टी क बर्तन बनाता था, और कोई लकडी का काम किया करती था। इस प्रकार सबका लग-अलग काम बट गया । एक गांव के लोग अपनी विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए चीजों की अदला-बदली कर लिया करते थे। बढ़ई तथा कुम्हार अपनी चीज किसान को देकर उनसे अन्न प्राप्त कर लेते थे। 

युद्ध का आरम्भ :-उत्तर-पाषाण काल में विभिन्न बस्तियों में युद्ध भी आरम्भ हो गये। अतएव आत्मरक्षा के लिए गांव के चारों ओर खाई बना दी जाती थी, जिससे शत्र सहसा गांव में न घुस सकें। यह लोग पत्थर के ही बने हथियारों का युद्ध में प्रयोग करते थे और उन्हीं से अपनी रक्षा किया करते थे। 


धर्म:- खुदाई में कुछ नारी मूर्त्तियां मिली हैं, जिससे यह अनुमान लगाया गया है कि उत्तर-पाषाण काल के लोग मातृदेवी के उपासक थे। अपनी देवी को प्रसन्न करने के लिए यह लोग सम्भवतः पशुओं की बलि भी दिया करते थे। उनका विश्वास था कि ऐसा करने से पृथ्वी माता प्रसन्न होती है और पशु या कृषि में वृद्धि होती है। 

निष्कर्ष:- उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस काल के परिवर्तन बड़े ही क्रान्तिकारी थे। अब सभ्यता की दौड़ में मनुष्य बहुत आगे बढ़ गया था। कृषि तथा पशुपालन का कार्य आरम्भ हो जाने के कारण अब उसमें सहकारिता बहुत बढ़ गई। वह अब एक स्थान पर गांवों में स्थायी रूप से निवास करने लगा और वह उसकी मातृभूमि हो गई और उसके प्रति उसका विशेष प्रेम हो गया। अब मनुष्य के पास भूमि, घर, पश, अन्न तथा अन्य उपयोगी विस्तार हो गई। अतएव व्यक्तिगत संपत्ति का उदय हो गया और धन-सम्पन्नता तथा दरिद्रता । का भी जन्म हो गया। सारांश यह है कि उत्तर पाषाण काल, पूर्व पाषाण काल की अपेक्षा सभ्यता तथा संस्कृति के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ गया था। 

धातु काल:-पाषाण काल के बाद धात काल का आरम्भ हुआ । कुछ विद्वानों का विचार है कि धातु काल के लोग, पाषाण काल के लोगों से भिन्न थे आर उत्तर-पश्चिम के मार्गो से भारत में आये थे। अन्य विद्वानों के विचार में धातु काल के लोग उत्तर-पाषाण काल के लोगों की ही पूर्वज थे। इस मत के समर्थन में दो बातें कही जाती हैं। पहली बात यह है कि धात काल के प्रारम्भ में पाषाण तथा धातु का साथ-साथ प्रयोग होता था और दूसरी यह कि इस संधि काल की वस्तुओं का आकार तया बनावट में बड़ी समानता है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तर-पाषाण काल की सभ्यता धीरे-धीरे उन्नति कर धातु काल की सभ्यता में बदल गई। 

 धातु काल का अर्थ:-धातु काल उस युग को कहते हैं जब मनुष्य ने पत्थर के स्थान पर धातु का प्रयोग करना आरम्भ किया। सबसे पहले मनुष्य ने तांबे का, उसके बाद कासे का और अन्त में लोहे का प्रयोग करना आरम्भ किया । चुंकी इन धातुओं का प्रयोग निरन्तर आधुनिक काल तक होता चला आ रहा है, अतएव उत्तर पाषाण काल से आज तक क काल को धातु काल समझना चाहिए। इस लम्बे काल में मानव सभ्यता का धीरे-धीरे विकास होता गया है आर आज वह इतने आश्चर्यजनक कार्य कर रहा है जो पुराने जमाने में असंभव नहीं समझे जाते थे, वरन उनके बारे में कोई सोचता भी ना था। इस लम्व धातु काल को तोन भागो में वादा जाता है अथात् ताम्र काल, कांस्य काल, लौह काल । परन्तु कांस्य काल हमारे दश में नहीं आया, क्योंकि तांबे के बाद ही इस देश में लोहे का प्रयोग आरभ हो गया। 

ताम्र काल:-जिस काल में मनुष्य ने स्थिर और ताँबे के औजारों का साथ-साथ प्रयोग किया, उस काल के ताम्र पाषाणिक काल कहते हैं । सर्वप्रथम जिस धातु को औजारं में प्रयुक्ति किया गया था, यह थी तांबा । ऐसा माना जाता है कि ताबे का सरंप्रयम प्रयोग करोब 5000 ई०पू०में किया गया। भारत में ताम्र पाषाण अवस्था के मुख्य क्षेत्र दक्षिण-पूर्वी राजस्थान मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग, पश्चिमी महाराष्ट्र तथा दांक्षिण-पूर्वी भारत में है। दक्षिण पूर्वी राजस्थान में स्थित बनास घाटी के सूखे क्षेत्र में आदार एवं गिलुंद नामक स्थानों की खुदाई की गयी। मालवा कायथा एवं शरण स्थानों पर भी खदाई का कार्य सम्पन्न हुआ, जो पश्चिमी मध्य प्रदेश में स्थित है। खुदाई में मालवा से प्राप्त होने वाले मृदभाणड ताम्र पाषाण काल की खुदाई। में प्राप्त अन्य मृद भाण्ड मे सर्वोत्तम माने गये हैं। 

यातायात के साधनों में वृद्धि:-पाषाण काल में बोझा ढोने का काम मनुष्य स्वयं करता था, परन्तु ताम्र काल में बोझा ढोने का काम पशुओं तथा गाड़ियों द्वारा किया जाने लगा। बोझा ढोने के लिए सबसे पहले बैलों का प्रयोग किया गया। परन्तु बाद में गधों, घोड़ों तथा ऊंटों का प्रयोग होने लगा। पशुओं के साथ-साथ पहियेदार गाड़ियों का भी बहुत अधिक प्रयोग होने लगा। जल यात्रा के लिए नावों का भी निर्माण आरंभ हो गया।

 कृषि में उन्नति:- कृषि का काम उत्तर पाषाण काल में ही शुरू हो गया था, परन्तु अब व्यापक रूप में की जाने लगी। पशुओं की संख्या में वृद्धि हो जाने के कारण अब उनके चारे तथा रखने की उचित व्यवस्था करनी पड़ी। पशुओं के लिए मोटे अन्न की खेती की जाने लगी। 

कार्यकुशलता में वृद्धि:- धातु के काम में कुशलता की बड़ी आवश्यकता होती है। अतएव अपने कार्य में निपुणता प्राप्त करने के लिए अब लोग पूरे समय अपने ही कार्य में लगे रहते थे। इस प्रकार विभिन्न प्रकार के कार्यों में विशेषज्ञ होने लगे जो अपने कार्य में बड़े कुशल होते थे। अब कार्य विभाजन का सिद्धान्त बुहत आगे बढ़ गया और लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये दूसरों पर निर्भर रहने लगे। इस प्रकार मनुष्य स्वावलंबी से परावलंबी हो गया। 

भवन निर्माण का आरम्भ :-धूप में सुखाई तथा आग में पकी हई ईंटों के मकानों का निर्माण इसी काल में आरंभ हुआ था। यह मकान बड़े सुविधाजनक होते थे और इनमें सुरक्षा की पूरी व्यवस्था रहती यी। यह मकान अब इतने बड़े होते थे कि उनमें मनुष्य, पशु तथा सामान के लिये अलग-अलग प्रवन्ध रहता था। 

धार्मिक भावना का आरम्भ :-कृषि करने के कारण प्रकृति की कृपा पर यह लोग अत्यधिक निर्भर रहने लगे। अतएव प्राकृतिक शक्तियों में इनका बड़ा विश्वास हो गया और देवी-देवता के रूप में वे इन शक्तियों की पूजा करने लगे। पूजा के लिये मंदिरों का भी निर्माण शुरू हो गया । धार्मिक भावना के उदय क साथ-साथ अंधविश्वास भी इन लोगों में उत्पन्न हो गया और जादू-टोना में यह लोग विश्वास करने


ताम्र पाषाणिक संस्कृति संस्कृति 
1. आहार संस्कृति     -लगभग 2800-1500ई० पू० 
2 कायथा संस्कृति      लगभग 2450 -1700ई० पू 
3. मालवा संस्कृति       लगभग 1900 -1400 ई०पु०
4. सावलदा संस्कृति।    लगभग 2300 - 2000 ई०पू०
5. जोर्वे संस्कृति           लगभग 1500 -1900 ई० पू
6. प्रयास संस्कृति         लगभग  2000 - 1400ई० पू०
7. रंगपुर संस्कृति          लगभग 1700 -1400 ई० पु० 

इस काल के लोग लेखन कला से परिचित नही थे। राजस्थान और मानता में प्राप्त मिटटी निर्मित वृषभ की मूर्ति एवं इनाम गांव से प्राप्त मातृदेवी की मूर्ति से लगता है कि ये लोग वृषभ एवं मातृदेवी की पूजा करते थे। तिथि क्रम के अनुसार भारत में तो पाषाण वस्तियों की अनेक शाखाएं हैं। कुछ हड़प्पा काल की हैं, कुछ हड़प्पा संस्कृति की समकालीन हैं। हड़प्पा कालीन संस्कृति के अन्तर्गत राजस्थान के कालीबंगा  एवं हरियाणा के बनवाली स्पष्टतः ताम्र-पाषाणिक अवस्था के हैं। 1200 ई०पू० के लगभग ताम्र-पाषाणिक संस्कृति का लोप हो गया। केवल जोब्रे स्कृति ही 700 ई०पू० तक बनी रही सकी।


लौह काल:- हमारे देश में ताम्र काल के बाद लौह काल का आरम्भ होता है। लोह काल का आरंम उत्तर तथा दक्षिण भारत में एक साथ नहीं हुआ। दक्षिण भारत में, उत्तर पाषाण काल के बाद ही इसका प्रयोग आरम्भ हो गया था, परन्तु उत्तर भारत में तात्र काल के बाद इसका प्रयोग है । विद्वानों की धारणा है कि उत्तर भारत में इसका प्रयोग ईसा के लगभग 1000 वर्ष पूर्व हुआ होगा। विद्वानों की धारणा है कि लौह काल के लोग पामीर पठार की ओर से आये थे और धीरे-धीरे महाराष्ट्र में फैल गये। कालान्तर में मध्य प्रदेश के वनों को पार कर यह लोग बंगात की ओर चल गये। लौह काल के मनुष्य के जीवन का वैज्ञानिक विकास आरंभ हो गया और उनके जीवन में वहत बड़े क्रान्तिकारी परिवर्तन होने लगे। मनुष्य के जीवन को सुखमय बनाने तथा उसकी सभ्यता तथा संस्कृति की उन्नति में अन्य किसी धातु से उतनी सहायता नहीं मिली जितनी लौह से मिली है। उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि मानव सभ्यता का क्रमिक विकास हुआ है और जंगली अवस्था से पूर्ण सभ्य जीवन की ओर अग्रसर होता गया है। इस विकास में यह विभिन्न स्तरों से गजरा है और जीवन को क्रमशः अधिक सभ्य बनाने में सफल रहा। इस विकास की गति उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है और इसके अन्त विकास की संभावनायें विद्यमान हैं।




दोस्तो इस भाग में हमने भारत के  पाषाण काल, मध्यपाषाण काल, ताम्र पाषाण पुरापाषाण काल की संस्कृति तथा नवपाषाण काल की विशेषता का विस्तृत अध्ययन  किया है। ऐसे ही अध्यन समाग्री के लिए  हमारे site को follow जरूर करे।








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